श्रीमद भगवद गीता - प्रथम अध्याय: एक विवेचना Shrimed Bhagwad Gita (1st Chapter) An interpretition
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श्रीमद भगवद गीता - प्रथम अध्याय: एक विवेचना Shrimed Bhagwad Gita (1st Chapter) An interpretition अर्जुन विषाद, Delusion of Arjuna

Dinesh Kumar2021
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श्रीमद भगवद गीता की आज के आधुनिक सन्दर्भ में द्वन्द ग्रस्त व्यवसायी (प्रोफेशनल) मानस के लिए प्रस्तुत एक विवेचना। मान्यवर , आपसे सेल्फ डेवलपमेंट हेतु योगिक साइकोलॉजी की एक कालहीन रचना के विषय में आज के आधुनिक सन्दर्भ में कुछ कहना है। उस ज्ञान के विषय में कुछ कहना है जिसके नाम से हम जन्मो से परिचित होंगे परन्तु उस ज्ञान के वास्तविक मर्म को हम संभवतः नहीं जान पाए। यह उस ज्ञान की चर्चा है जिसे जानने के उपरांत मनुष्य के भीतर ऐसा प्रत्यावर्तन होने लगता है की छोटी छोटी समस्याओं भर में खर्च होता हुआ जीवन भीतर कहीं अधिक क्षमतावान होतकर बाहर प्रगट होने लगता है। यह ज्ञान मनुष्य की आन्तरिक उत्पादक क्षमताओं को उत्कृष्टता द्वारा संस्कारित कर डालता है। विश्वास करे,,, किसी अनजाने काल में अनजानी संख्या में महान वैज्ञानिको ने मानवीय मस्तिष्क में घटने वाले घटनाक्रमों पर अनूठे अनुसन्धान किये थे। वह काल भारतीय संस्कृति का वह सुनहरा काल था जब उन अनुसन्धान कर्ताओ को ऋषि के नाम का संबोधन दिया जाता था . ऋषि शब्द ऋत से बना है जिसका अभिप्राय है ब्रह्माण्डीय संविधान का ज्ञान। उन महान वैज्ञानिको ने काल की सीमओं से कहीं ऊपर उठ कर मनुष्य के जीवन का गहन अध्ययन किया और जीव, प्रकृति एवं ईश्वरीय नृत्य का अध्ययन करते हुए कुछ कालहीन सूत्र रच दिए। अर्थात किसी भी काल के मनुष्य के जीवन की सभी प्रकार की परिस्थितियों हेतु उपयुक्त मार्गदर्शन। ऋषियो के उस अनूठे अनुसन्धान के अंतर्गत मनुष्य के जीवन का कोई भी पक्ष अछुता नहीं बचा है। ऋषियो का अनुसन्धान हम तक श्रुतिओं के स्वरुप में पहुंचा है। श्रुतिओ का अर्थ है वह ज्ञान जो किसी भी काल के लिए उतना ही उपयुक्त एवं श्रेष्ठ है जितना की वह किसी भी अन्य काल के लिए हो सकता है। उन्ही श्रुतियों में से एक सर्वोच्च स्तर पर जाना गया संकलन है श्रीमद भगवद गीता। श्रीमद भगवद गीता एक संकलन है। यह ज्ञान सांकेतिक स्वरुप में उन महान ऋषियो ने मनुष्य को अदृश्य आन्तरिक अवस्थाओं से अवगत एवं परिचित करवाने हेतु श्लोको के रूप में गूंथा है। महाभारत नमक मुख्या ग्रन्थ से उदृत यह 700 श्लोक जिन पत्रों का वर्णन करते है वह वस्तुतः हमारे ही भीतर अवस्थित अथवा घटने वाली अनेको मन, बुद्धि,चित्त एवं अहंकार के स्तर की घटनाये है। एक बार जब हमे ऋषि के उस वास्तविक मन को बोध होने लगता है तब एक एक श्लोक आत्म परिष्कार की तकनीक बन कर सामने उभरने लगता है। आज के मानस के समक्ष अनेको प्रकार के द्वन्द एवं विषमताएं सामने मुख खोले हुए खड़ी रहती है। तीव्रता से होते हुए परिवर्तन और बड़ती हुई आशाएं मनुष्य को भागती तो रहती है परन्तु कटा बटा वह व्यक्तित्व बस खोया पाया बना बना मात्र खर्च भर होता चला जाता है। सच तो यह है की आज का आधुनिक मनुष्य अपने बाहरी स्वरूपों में कितना भी अपने आप को संजो क्र चलता रहे किन्तु वास्तविक में वह भीतर आन्तरिक व्यवस्था, शांति और आनंद से दूर है। और एक बात सदेव स्मरण रखनी होगी की जब तक जीव आन्तरिक स्तरों व्यवस्थित, शांत एवं आनंदित नहीं है तब उसके समूचे बाहरी योगदान मात्र नियम पूर्ति की सीमाओं तक अटके रहेंगे। प्रबन्धन की विधाओं में श्रीमद भगवद गीता का आधुनिक सन्दर्भ में उपलब्ध यह ज्ञान किसी भी स्तर के अधिकारी को आन्तरिक स्तरों पर ऐसे मनन हेतु प्रेरित करता है जिसके परिणाम स्वरुप कुछ अध्ययन के उपरांत ही मस्तिष्क में ऐसे परिवर्तन होने लगते है जिनके द्वारा जीव अपना आत्म अवलोकन कर अपनी अनेको आन्तरिक बाधाओं को जान कर निर्मूल करने लगता है। आधुनिक मानस के सन्दर्भ में गीता ज्ञान का यह शोध वर्तमान में प्रथम अध्याय के स्वरुप में प्रकशित किया गया है। यह पुस्तक वर्तमान में अपने प्रकाशन के दूसरे ही दिन 10000 परिवारों में बिना किसी भी प्रकार बाजारी बिक्री तंत्र के पहुच गयी थी। इस ग्रन्थ का विमोचन अभी हाल ही में 17 फरवरी को किया गया है। आप भी इस अनूठे शोध से जुड़ कर ऋषियो की थाती का अपने आज के जीवन और उसकी समस्याओं के सन्दर्भ में दृष्टि प्राप्त कर सकते है। यह पुस्तक मूलतः हिंदी भाषा में लिखी एवं प्रकशित की गयी है परन्तु अन्य क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए इसी पुस्तक में लगभग 50 पृष्ठ अंग्रेजी भाषा को भी प्रदान किये गए है। अंग्रेजी भाषा में भी इस पुस्तक का समुच विवरण स्थान प्राप्त किये है। 240 पृष्ठों की यह रचना आपके समक्ष मात्र 250 रुपयों में प्रस्तुत है(डाक खर्च इत्यादि अतिरिक्त). यह एक कालहीन ग्रन्थ जिसकी रचना अनजाने काल में योगिओं के मध्य उपस्थित आंतरिक स्फुरणा के रूप में हुई। भगवद गीता काल की सीमाओं से पर है अतः इसके मुख्या पत्र प्रत्येक काल में ठीक उसी प्रकार टटोले जा सकते हैं जैसे कभी रहे होंगे। प्रत्येक द्वन्द ग्रस्त मानस एक अर्जुन ही तो है - प्रत्येक दिया प्रेरणा जो अनेक विषयों पर हमारे आंतरिक द्वन्द का निवारण करती है वह कृष्णा ही तो है। योगिक साइकोलॉजी का यह अद्वितीय ग्रन्थ अकाट्य सत्य और सूत्रों को अपने में समेटे हुए है। ध्यान रहे की श्रीमद भगवद गीता केवल पढ़ने की एक पुस्तक नहीं है। यह मनन का स्त्रोत है। जो इस कलहीन अकाट्य सत्य में से ज्ञान को बटोरना चाहते है उन्हें यह जान लेना चाहिए की श्लोक के भावार्थ पर न्यूनतम पंद्रह दिन का मनन आवश्यक है। गीता का जिज्ञासु इस ग्रन्थ को अपने तकिये के निचे रख कर सोये तो उसका इस ज्ञान से सम्बन्ध और गहराता जायेगा। इसका तात्पर्य यह है की इस ज्ञान की निकटता जिज्ञासु को अपने प्रकाश की परिधि में समेटे रखती है। अभी आपके समक्ष इस ग्रन्थ का प्रथम अध्याय की विवेचना प्रस्तुत है। मन है की इस ग्रन्थ के समस्त 18 अध्यायों की विवेचना की जाये। यह ज्ञान मुझे अनेकों समर्थ ऋषिओं द्वारा रचित पुस्तकों एवं उन्ही की द्वारा दिए गए प्रकाश के द्वारा के द्वारा संभव हुई है

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